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आयुर्वेद चिकित्सको के साथ नयिन्सफी हो रहा है



   

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गायत्री मन्त्र का अर्थ

गायत्री मन्त्र का अर्थ ॐ भूर्भुवः स्वः " तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् " । =========================================== जप के पूर्ण फल को या इष्ट की असीम कृपा का भाजन बनने के लिए और जप के समय मन को अनेक कल्पनाओं से विरत करने का साधन मन्त्रार्थ चिन्तन है । इस परम शक्तिशाली गायत्री मन्त्र का अर्थ मैने अनेक लोगों के दूवारा लिखा देखा है । और उन पर व्यंगबाणों की बौछार भी । जो आप सब मनीषी इससे पूर्व पोस्ट में देख चुके हैं । इस मन्त्र का " तत् " और "यो " तथा " भर्गो " शब्द विद्वत्कल्पों की जिज्ञासा के विषय बने रहे । आलोचकों का मुहतोड़ उत्तर दिया जा चुका है । उससे जिज्ञासुओं की जिज्ञासा का शमन भी हुआ होगा । पर कुछ अनभिज्ञों ने तो "भर्गो " की जगह " भर्गं " करने का दुस्साहस भी किया ; क्योंकि " भर्गं " उन्हे द्वितीया विभक्ति का रूप लगा और " भर्गो " प्रथमान्त पद । पहले हम भर्ग शब्द पर चर्चा करते हैं --- भर्ग शब्द हमारे सामने हिन्दी रूप में उपस्थित होता है और जब उसका संस्कृत रूप में...

अथ निदिध्यासनम्

<<अथ निदिध्यासनम् >> नारायण ! “ निदिध्यासन ” का मतलब क्या है ? बहुत से लोग इसका मतलब ले लेते हैं कि आँख मीँचकरबैठने को ही निदिध्यासन कहा जाता है । " वार्तिककार भगवान् श्रीआचार्य सुरेश्वर" कहते हैं : " निदिध्यासस्वेतिशब्दात् सर्वत्यागफलं जगौ । न ह्यन्यचिन्तामत्यक्त्वा निधिध्यासितुमर्हति ॥ " आचार्यने यहाँ यह नहीं कहा है कि " मेरी बात सुनने के बाद निदिध्यासन करो " । वेदान्त शास्त्र में मनन , निदिध्यासन सहकृत श्रवण को ज्ञान के प्रति साक्षात् साधन कहा है । श्रवणकरने के लिए निदिध्यासन करें । महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा " आओ बैठो , निदिध्यासन करो । मैं व्याख्यान करूँगातुम निदिध्यासन करो । " सब चीज़ों के त्याग का फल हीआचार्य ने निदिध्यासन कहा है । उस निदिध्यासन का स्वरूप क्या है ? जो निरन्तर गुरु के मुख से सुना जा रहा है , उसका निरन्तर विचार । " अन्तर " काअर्थ होता है - बीच बीच में जगह छोड़ना । " निरन्तर" का अर्थ होता है बीच बीच में जगह न छोड़ना । जिस व्यक्ति कोकिसी कर्म की चिन्ता है वह निदिध्यासन नहीं कर स...

द्विविध भ्रम

भ्रम होने पर भी प्रवृत्ति सफल हो जाये तो भ्रम कोसंवादी कहते है तथा प्रवृत्ति विफल रहे तो भ्रम विसंवादी होता है । दीपक में मणिका भ्रम हो तो निकट जाने पर भी मणिलाभ न होने से भ्रम विसंवादी है किन्तु मणि -प्रभा में मणि का भ्रम हो तो निकट जाने से मणि मिल जाती है अतः भ्रम संवादी है ।इसी प्रकार शास्त्रानुसार आत्मतत्त्व को परोक्ष समझना भ्रम तो है लेकिन उस ज्ञानपर निष्ठा रहे तो क्यैंकि जिसके बारे में वह ज्ञान है वह वास्तव में आत्मा ही हैइसलिये उस पर एकाग्र रहने से यथोपदेश उसकी अपरोक्षता भी समझ सकना सुसम्भव है जिससेउसे संवादी भ्रम के स्थानापन्न समझना उचित है । अखण्ड आत्मा से अन्य नाम - रूपोंके ध्यानों को विसंवादी भ्रम मानना पड़ता है क्योंकि वास्तविक आत्मतत्त्वनामरूपात्मक है नहीं । अखण्ड तत्त्व की उपासना में यह वृत्ति नहीं बनायी जाती किआत्मा परोक्ष है ! वृत्ति तो यही बनाते हैं कि वह अपरोक्ष है किन्तु अपने मेंसामर्थ्य न होने से अपरोक्षता का अनुभव नहीं होता । शास्त्र श्रद्धा से वह ज्ञानप्रमारूप तो माना ही जाता है अतः यदि उसका विरोधी कोई ज्ञान न आये तो फलतः वहप्रमा ही रहेगा क्योंकि ...