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❀ याज्ञवल्क्य महामुनि ❀ ═════ 22 ═════

∬ श्री महादेवेन्द्र गुरुभ्यो नमः ∬
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❀ याज्ञवल्क्य महामुनि ❀
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नारायण ! भगवती श्रुति माता ने परम कारण को न केवल विज्ञान और आनन्द कहा वरन् " ब्रह्म " भी कहा । विज्ञान - आनन्द रूप यह आत्मा " ब्रह्म " शब्द से इसलिये कहा गया ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सारा ही जडवर्ग अध्यस्त है । ब्रह्म का अर्थ है देश - काल - वस्तु की सीमाओं से रहित । जड सत्य हो तो आत्मा वस्तु से परिच्छिन्न ही रहेगा क्योंकि आत्मा जडभिन्न ही होगा । जब आत्मा को ब्रह्म कह दिया तो निश्चित हो गया कि उसे सीमित करने वाल कोई देश - काल - वस्तु सम्भव नहीं । शरीरपरिच्छन्न आकाश एक ही है लेकिन नाक - कान आदि के कारण नासिकाकाश , कर्णविवराकाश आदि भेद कल्पित हो जाता है । ऐसे ही एक ब्रह्म में ही अज्ञानादि की यह सुदृढ कल्पना सर्वजनप्रसिद्ध है । मायावी आसमान में मायिक शरीर दिखा देता है और उस असत्य शरीर के कारण मायावी में सद्वितीयता का व्यवहार होता है - " यह मायावी नीचे खड़ा है , जो आसमान में दीख रहा है वह दूसरा है ! " इत्यादि । मायादेह से आकाश में भी परिच्छेद - व्यवहार हो जाता है - " उसके सामने की जगह में , पीछे की जगह में " इत्यादि । ये सभी भेद सर्वथा असत्य हैं क्योंकि जिस उपाधि के निमित्त से हैं वह मायिक देह भी असत्य है । ऐसे ही अज्ञानादि उपाधियाँ भी कल्पित हैं तो उनसे सम्भव होने वाला भेद असत्य है इसमें कहना ही क्या ! इस प्रकार एक होने से सजातीयभेद - सहित, अद्वितीय होने से विजातीयभेदसहित और एकरस होने से स्वगतभेदरहित आत्मा ही जगत्कारण है ।
नारायण ! विज्ञान - आनन्दैकरस रूप से निरूपित ब्रह्म जगत का कारण नहीं है फिर भी मायारूप उपाधि से वही सर्वज्ञ - सर्वशक्ति होकर जगत्कारण हो जाता है । यह तात्पर्य स्पष्ट करने के लिये ही यहाँ श्रुति ने कहा कि धनदान में संलग्न लोगों से सम्बद्ध कर्मों के फललाभ के लिये जो प्रतिभू - तुल्य है { जमानतदाता की तरह है , जिस पर भरोसा कर ही लोग कालान्तर में फल पाने की आशा से कर्म करते हैं } वही शरीरादि जगत् का कारण है । शुद्ध ब्रह्म कर्मफलदाता नहीं , मायोपाधिक ही फलदाता है ।
नारायण ! यद्यपि शुद्ध चेतन फलप्रद जगत्कारण हो नहीं सकता तथापि श्रुति ने विज्ञानानन्दरूप ब्रह्म को ही बलप्रदादि कह दिया है । इसमें यह अभिसन्धि है : मायाशबल को कारण कहने पर माया भी कारणकोटि में आ जाती है किन्तु माया जड होने से चेतन सत्ता के बिना अपना ही धारण नहीं सकती तो प्रपञ्च का निर्वाह क्या करेगी ! आवचरणशील जड अज्ञानरूप माया जडहेतु हो यह संगत नहीं - ऐसा समझकर श्रुति ने केवल ब्रह्म को ही " परायण " अर्थात् परम अवलम्बन कहा है क्योंकि वही अधिष्ठान है जिसके सहारे सभी अवस्थित है । शुद्ध परमात्मा केवल माया का ही अधिष्ठान होने से परायण हो इतना ही नहीं वरन् मुक्त का भी परायण है । जिस विद्वान् के लिये श्रुति ने " तिष्ठमानस्य तद्विदः " द्वारा कहा है कि ब्रह्मचर्य आदि साधनों से सम्पन्न जो अधिकारी " मैं ब्रह्म हूँ " इस तरह अपने पर से आवरण हटा कर बाध की अवधिरूप से रहता है और " ब्रह्म मैं हूँ " इस निश्चय वाला होता है , उस विद्वान् का परायण - परम अधिष्ठान - भी वही ब्रह्म है जो विज्ञानानन्दरूप है ।
इस प्रकार " इसे कौन पैदा करता है ? " यों प्रातःस्मरणीय महामुनि याज्ञवल्क्य ने जिस उपस्थित ब्राह्मणों से परमात्मविषयक प्रश्न किया , वे द्विज उस विज्ञान - आनन्दरूप परमेश्वर को नहीं जानते थे जो मायोपाधिवश कर्मफलदाता है और निरुपाधिक रूप से ब्रह्मवेत्ता का निज स्वरूप है । महामुनि याज्ञवल्क्य के प्रश्न का " विज्ञानमानन्दं ब्रह्म " इत्यादि उत्तर विदेहवासी जनक - सभा में उद्घोषित नहीं हुआ था । यह तो केवल कृपामात्र से प्रेरित भगवान् वेद के वाक्य से हम जैसे अधिकारियों ने सुना - समझा है । { यद्यपि यहाँ आये सभी वाक्य वेद भगवान् के हैं तथापि जो वाक्य किसी व्यक्तिविशेष जैसे याज्ञवल्क्य , उद्दालक आरुणि , शाकल्य विदग्ध आदि द्वारा कहे गये रूप से नहीं उल्लिखित हैं उन्हें स्वयं वेद का वाक्य है ऐसा व्यवहार हो जाता है , जैसे नाटक में कुछ वचन पात्रों के और कुछ नाटककार के हैं ऐसा व्यवहार होता है जबकि पात्रवचन भी मूल नाटककार के ही होते हैं , वेसे प्रकृत में भी समझ सकते हैं । } ।
नारायण ! शिष्य को औपनिषद् उपाख्यान सुनाने वाले श्रीगुरु इस कथा का उपसंहार करते हैं : " याज्ञवल्क्य , जिनका उपनाम " वाजसनेयक " था और जिन्होंने साक्षात् भगवान् सूर्य से शिक्षा ग्रहण की थी वे बुद्धिमानों में अग्रगण्य निश्चित हुए यह इस प्रसंग में स्पष्ट है । विदेहवासी जनक द्वारा गायों की घोषणा और मुनि द्वारा उन्हें आश्रम की ओर भेज देना तो एक बहाना था , वस्तुतः तो महर्षि याज्ञवल्क्य की ब्रह्मनिष्ठा के प्रदर्शन द्वारा परमात्मविज्ञान की महत्ता का ख्यापन अभीष्ट था । तथापि पृथ्वी भर से आये विद्वान् ब्रह्मवेत्ताओं पर महामुनि याज्ञवल्क्य ने विजय तो प्राप्त कर ही ली । इतना ही नहीं , ब्रह्मज्ञों से द्वेष करने वाले " विदग्ध शाकल्य " को याज्ञवल्क्य की वाणी में स्थित हो आदित्य ने भस्मावशेष भी कर दिया । { इसमें दोनों बतातें बतायीं कि ब्रह्मविद्वरिष्ठता पाने का प्रयास करते रहना चाहिये और ब्रह्मवेत्ताओं से कभी थोड़ा भी द्वेष नहीं करना चाहिये । } मिथिलानरेश जनक सभा में अनिर्णीत विषय के प्रति सश्रद्ध जिज्ञासु हो गया , अतः महामुनि याज्ञवल्क्य ने ब्राह्मणों से जो पूछा था उसका उत्तर जैसा " भगवान् आदित्य " से उन्होंने समझा समझा था वैसा " राजा जनक " को विस्तार से समझाया । " इति शम् ।
सूचना : उपनिषद् में जनक याज्ञवल्क्य का सत्संग - संवाद विस्तृत रूप से प्रकाशित है । अगले सत्संग में हम " याज्ञवल्क्यजनकसंवाद " का निरुपण करेंगे । शुभ हो । मङ्गल हो।
नारायण स्मृतिः

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